प्रकृति की गोद में स्थित, रियासतकाल में सत्ता का केन्द्र रहे अविभाजित सरगुजा वर्तमान में सूरजपुर जिले के प्रतापपुर तहसील के ‘मोती बगीचा’ में आज भव्य भवन में संचालित इस महाविद्यालय की स्थापना सन् 1989 में की गई। महाविद्यालय के वर्तमान भवन का लोकार्पण वर्ष 2000 में अविभाजित मध्यप्रदेष के तत्कालीन मुख्यमंत्री म.प्र. शासन द्वारा किया गया। महाविद्यालय के भवन के चारों ओर पर्वत श्रृंखलायें होने से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे महाविद्यालय एक प्राकृतिक कटोरे में अवस्थित है। महाविद्यालय से लगभग 3 कि.मी. पर शिवपुर में स्वयंभू शिवलिंग एक आस्था का केन्द्र एवं नैसर्गिक पर्यटन स्थल के रुप में प्रख्यात है। महाविद्यालय के संस्थागत् चरित्र निर्माण हेतु नैसर्गिक सौन्दर्य तथा शांत वातावरण, जो शिक्षण की दृष्टि से अनुकूल परिस्थितियां मानी जाती हैं, स्वाभाविक रुप से प्राप्त है।

प्रारंभ में महाविद्यालय में कला संकाय के छः विषयों में अध्यापन की स्वीकृति शासन द्वारा प्राप्त हुई थी। सत्र 2002-03 से महाविद्यालय में एम. ए. हिन्दी की कक्षाएं जनभागीदारी से संचालित होने लगीं। तदनन्तर में जनभागीदारी से ही वर्ष 2008-09 से वाणिज्य स्नातक की कक्षाएं, सत्र 2012-13 से विज्ञान स्नातक एवं स्नातकोत्तर में अंग्रेजी, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र एवं भूगोल की कक्षाएं भी संचालित होने लगीं। वर्तमान में यह महाविद्यालय छात्र संख्या की दृष्टि से सूरजपुर जिले के बड़े महाविद्यालयों में से एक है।

वर्तमान में यह महाविद्यालय छत्तीसगढ़ राज्य के सूरजपुर जिले के प्रतापपुर ब्लाक में अवस्थित होकर संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय सरगुजा, अंबिकापुर  से सम्बद्ध है। महाविद्यालय में सत्र २०२४-२५ से ”नयी शिक्षा नीति २०२०” लागु है।

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